बिलासपुर । बिलासपुर के चर्चित फर्जी कार्डियोलॉजिस्ट मामले में पुलिस ने अपनी विस्तृत विवेचना पूरी करते हुए अपोलो अस्पताल प्रबंधन एवं चयन समिति के विरुद्ध साक्ष्य के अभाव में न्यायालय के समक्ष क्लोजर रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी है। वहीं, फर्जी दस्तावेजों और कथित रूप से गलत पहचान के आधार पर चिकित्सकीय सेवाएं देने के आरोपी डॉ. नरेन्द्र विक्रमादित्य यादव उर्फ नरेन्द्र जॉन कैम के विरुद्ध पहले ही अभियोग पत्र न्यायालय में पेश किया जा चुका है और उसके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई जारी रहेगी।
यह कार्रवाई थाना सरकण्डा में दर्ज अपराध क्रमांक 563/2025 के तहत की गई, जिसमें भारतीय दंड संहिता की धारा 420, 465, 466, 468, 471, 304, 34 (वर्तमान में भारतीय न्याय संहिता के समतुल्य प्रावधान) तथा मध्यप्रदेश आयुर्विज्ञान अधिनियम की धारा 24 के तहत अपराध दर्ज किया गया था।
शिकायत से शुरू हुई जांच
मामले की शुरुआत 9 अप्रैल 2025 को हुई, जब डॉ. प्रदीप शुक्ला ने थाना सरकण्डा में शिकायत दर्ज कराई। उन्होंने बताया कि वर्ष 2006 में उनके पिता स्वर्गीय पंडित राजेन्द्र प्रसाद शुक्ला का उपचार अपोलो अस्पताल, बिलासपुर में हुआ था। उपचार के दौरान डॉ. नरेन्द्र विक्रमादित्य यादव ने उनकी एंजियोग्राफी और एंजियोप्लास्टी की थी, जिसके बाद उनकी मृत्यु हो गई।
शिकायत में आरोप लगाया गया कि संबंधित चिकित्सक योग्य एवं पंजीकृत हृदय रोग विशेषज्ञ नहीं था और अस्पताल प्रबंधन ने आवश्यक सत्यापन किए बिना उसे कार्डियोलॉजिस्ट के रूप में नियुक्त कर दिया।
कई संस्थानों से जुटाए गए दस्तावेज
प्रकरण की विवेचना के दौरान पुलिस ने मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी, बिलासपुर, अपोलो अस्पताल, पुलिस अधीक्षक दमोह (मध्यप्रदेश), छत्तीसगढ़ मेडिकल काउंसिल, उत्तर बंगाल मेडिकल कॉलेज सहित अन्य संबंधित संस्थानों से दस्तावेज एवं जानकारी प्राप्त की।
जांच में यह सामने आया कि वर्ष 2006 में आरोपी अपोलो अस्पताल में कार्डियोलॉजिस्ट के रूप में कार्यरत था। अस्पताल ने उसका बायोडाटा (Resume) और नियुक्ति आदेश उपलब्ध कराया, लेकिन उसकी शैक्षणिक डिग्री तथा मेडिकल काउंसिल पंजीयन से संबंधित मूल दस्तावेज उपलब्ध नहीं करा सका।
जांच में सामने आए कई गंभीर तथ्य
विवेचना के दौरान पुलिस को कई महत्वपूर्ण तथ्य मिले। आरोपी ने स्वयं को MBBS, MRCP तथा इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजी में फेलोशिप धारक बताया था। हालांकि मेडिकल काउंसिल से प्राप्त जानकारी में “नरेन्द्र जॉन कैम” नाम से उसका वैध पंजीयन प्रमाणित नहीं हुआ।
दमोह में दर्ज प्रकरण की जांच में यह भी सामने आया कि आरोपी ने “नरेन्द्र जॉन कैम” नाम से आधार कार्ड, पैन कार्ड सहित अन्य दस्तावेज तैयार कराए थे। उसके शैक्षणिक दस्तावेजों में भी गंभीर विसंगतियां मिलीं। उत्तर बंगाल मेडिकल कॉलेज से प्राप्त जानकारी के अनुसार आरोपी के नाम पर वैध MBBS डिग्री जारी होने का रिकॉर्ड भी जांच के दौरान उपलब्ध नहीं मिला।
गिरफ्तारी के बाद पूछताछ में क्या बोला आरोपी
दमोह में दर्ज अपराध के आधार पर आरोपी को गिरफ्तार किया गया। बाद में प्रोडक्शन वारंट के जरिए उसे बिलासपुर लाकर पुलिस रिमांड पर पूछताछ की गई।
पूछताछ के दौरान आरोपी ने स्वीकार किया कि वह अपोलो अस्पताल में कंसल्टेंट कार्डियोलॉजिस्ट के रूप में कार्यरत था तथा उसने अनेक मरीजों की एंजियोग्राफी एवं एंजियोप्लास्टी की थी। पुलिस द्वारा चिकित्सकीय योग्यता संबंधी दस्तावेज प्रस्तुत करने का अवसर दिए जाने के बावजूद वह अपनी एमबीबीएस डिग्री के अलावा “नरेन्द्र जॉन कैम” नाम से किसी वैध विशेषज्ञता का प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सका। यह भी सामने आया कि उसने अस्पताल में नियुक्ति “नरेन्द्र विक्रमादित्य यादव” नाम से प्राप्त की थी।
27 मरीजों की मौत की जानकारी, लेकिन साक्ष्य नहीं मिले
विवेचना में यह जानकारी भी सामने आई कि आरोपी के कार्यकाल के दौरान उपचारित लगभग 27 मरीजों की मृत्यु हुई थी। हालांकि पुलिस को इस संबंध में प्रमाणित दस्तावेज अथवा अन्य पीड़ितों की ओर से पर्याप्त साक्ष्य प्राप्त नहीं हुए। केवल दो पीड़ित पक्षों द्वारा शिकायत दर्ज कराई गई।
उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर पुलिस ने आरोपी चिकित्सक के विरुद्ध अभियोग पत्र क्रमांक 671/2025 दिनांक 27 जून 2025 को न्यायालय में प्रस्तुत कर दिया।
अस्पताल प्रबंधन की भूमिका की अलग से हुई जांच
आरोपी के खिलाफ चार्जशीट दाखिल करने के बाद पुलिस ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 173(8) के तहत आगे की विवेचना जारी रखते हुए अपोलो अस्पताल प्रबंधन एवं चयन समिति की भूमिका की अलग से जांच की।
इस दौरान अस्पताल से दोबारा पत्राचार किया गया, डॉ. बी.आर. प्रेम कुमार से जानकारी ली गई, नियुक्ति से संबंधित उपलब्ध दस्तावेजों का परीक्षण किया गया तथा वर्ष 2006 के रिकॉर्ड उपलब्ध कराने का प्रयास किया गया।
अस्पताल ने रिकॉर्ड नहीं होने की बात कही
अपोलो अस्पताल प्रबंधन ने पुलिस को लिखित जवाब में बताया कि संबंधित नियुक्ति लगभग 17 से 18 वर्ष पुरानी है। उस समय रिकॉर्ड केवल हार्ड कॉपी में सुरक्षित रखे जाते थे। निर्धारित रिकॉर्ड संरक्षण अवधि पूरी होने के बाद पुराने अभिलेख उपलब्ध नहीं रहे, इसलिए नियुक्ति से संबंधित अतिरिक्त दस्तावेज उपलब्ध कराना संभव नहीं है।
विधिक राय में क्या सामने आया
पूरे प्रकरण की केस डायरी का परीक्षण वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों एवं जिला अभियोजन अधिकारी, बिलासपुर द्वारा किया गया। विधिक राय में कहा गया कि उपलब्ध साक्ष्यों से यह सिद्ध नहीं होता कि अपोलो अस्पताल प्रबंधन अथवा चयन समिति ने जानबूझकर, दुर्भावनापूर्ण अथवा किसी आपराधिक षड्यंत्र के तहत आरोपी चिकित्सक की नियुक्ति की थी।
अर्थात उपलब्ध साक्ष्य अस्पताल प्रबंधन की सक्रिय आपराधिक संलिप्तता सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं पाए गए।
पुलिस का अंतिम निष्कर्ष
संपूर्ण विवेचना के बाद पुलिस ने निष्कर्ष निकाला कि डॉ. नरेन्द्र विक्रमादित्य यादव उर्फ नरेन्द्र जॉन कैम के विरुद्ध फर्जी दस्तावेज, कूटरचना, धोखाधड़ी तथा अवैध रूप से चिकित्सकीय कार्य करने के पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध हैं और उसके विरुद्ध विधिवत अभियोग पत्र न्यायालय में प्रस्तुत किया जा चुका है।
वहीं, अस्पताल प्रबंधन एवं चयन समिति की भूमिका की पृथक जांच में उपलब्ध दस्तावेजों, गवाहों के बयान, पत्राचार और राय के आधार पर उनके विरुद्ध आपराधिक षड्यंत्र अथवा जानबूझकर की गई संलिप्तता सिद्ध करने योग्य कोई ठोस साक्ष्य नहीं मिला। इसके चलते पुलिस ने अपोलो अस्पताल प्रबंधन तथा डॉ. बी.आर. प्रेम कुमार के विरुद्ध साक्ष्य के अभाव में न्यायालय के समक्ष क्लोजर रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी, जबकि आरोपी चिकित्सक के विरुद्ध आपराधिक मुकदमा पूर्ववत जारी रहेगा।

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